बारिश वाली रात का बस स्टॉप Part 2 वहीं से शुरू होता है, जहां कबीर ने एक ऐसी बस के अंदर अपना दूसरा रूप देखा था, जो रात के 11:40 बजे एक सुनसान पहाड़ी सड़क पर अचानक आकर रुकी थी।
बस की पहली सीट पर बैठा दूसरा कबीर उसे देखकर मुस्कुरा रहा था। सफेद रेनकोट वाली रहस्यमयी लड़की बस में चढ़ चुकी थी और अंदर बैठे यात्री बिना पलक झपकाए कबीर को देख रहे थे।
कबीर को अब समझ आ चुका था कि यह कोई साधारण बस नहीं थी।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि इस बस का संबंध सिर्फ उस सुनसान बस स्टॉप से नहीं, बल्कि उसके अपने अतीत और भविष्य से भी था।
आखिर दूसरा कबीर कौन था? 11:40 बजे आने वाली बस का रहस्य क्या था? और वह बस पिछले 32 वर्षों से बंद होने के बावजूद हर बरसात में दिखाई क्यों देती थी?
पढ़िए बारिश वाली रात का बस स्टॉप Part 2, इस रहस्यमयी Hindi Horror Story का अंतिम और सबसे डरावना भाग।
पिछला भाग पढ़ें:
बारिश वाली रात का बस स्टॉप Part 1
कबीर की सांसें जैसे वहीं रुक गईं। बस की पहली सीट पर बैठा वह चेहरा उसका अपना था। वही दाढ़ी, वही काली जैकेट, वही कैमरा और यहां तक कि उसकी दाईं भौंह के ऊपर मौजूद छोटा-सा निशान भी बिल्कुल वैसा ही था। लेकिन एक चीज अलग थी। बस में बैठा दूसरा कबीर मुस्कुरा रहा था। ऐसी मुस्कान, जिसमें खुशी नहीं थी, सिर्फ एक अजीब इंतजार था।
दूसरे कबीर ने धीरे-धीरे अपना सिर एक तरफ झुकाया और बस के धुंधले शीशे पर उंगली से कुछ लिखा—“देर मत करो…”
कबीर एक कदम पीछे हट गया। उसके जूते पानी में धंस गए। तभी उसे कुछ अजीब महसूस हुआ। बारिश बंद हो चुकी थी। कुछ सेकंड पहले तक टीन की छत पर बारिश इतनी तेज पड़ रही थी कि उसकी आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था, लेकिन अब एक बूंद भी नहीं गिर रही थी। पूरा जंगल अचानक शांत हो गया था। इतना शांत कि कबीर को अपनी धड़कनें तक साफ सुनाई दे रही थीं।
फिर बस के भीतर से किसी के धीरे-धीरे हंसने की आवाज आई। कबीर ने बस की तरफ देखा। एक-एक करके सभी यात्रियों ने अपनी गर्दन उसकी तरफ मोड़ दी। उनके चेहरे अब भी अंधेरे में छिपे हुए थे, लेकिन उनकी आंखें साफ दिखाई दे रही थीं। वे आंखें काली और बिल्कुल स्थिर थीं। सबसे डरावनी बात यह थी कि उनमें से किसी ने पलक तक नहीं झपकाई।
कबीर ने अपनी नजरें हटानी चाहीं, लेकिन उसकी आंखें जैसे उन चेहरों से चिपक गई थीं। तभी सफेद रेनकोट वाली लड़की धीरे-धीरे बस की तरफ बढ़ी। उसने बिना कबीर की तरफ देखे बस की पहली सीढ़ी पर पैर रखा। जैसे ही उसका पैर बस के अंदर पड़ा, भीतर से वही भारी आवाज गूंजी, “सबका समय तय होता है।” कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज फिर आई, “आज किसकी बारी है?”
कबीर का गला सूख गया। उसने तुरंत मोबाइल निकाला, लेकिन स्क्रीन पूरी तरह काली थी। न नेटवर्क था, न समय और न ही बैटरी का निशान। उसने पावर बटन दबाया, लेकिन मोबाइल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जैसे वह मोबाइल नहीं, किसी बंद दुनिया का हिस्सा हो।
उसे अचानक गांव के उस बुजुर्ग की बात याद आई—“अगर आधी रात वाली बस दिखे तो उसके यात्रियों की तरफ मत देखना।” कबीर के शरीर में सिहरन दौड़ गई। बहुत देर हो चुकी थी। वह उन सबको देख चुका था और अब शायद वे भी उसे देख चुके थे।
अचानक बस का हॉर्न बजा। कबीर ने अपने कान बंद कर लिए। वह सामान्य हॉर्न नहीं था। उस आवाज में जैसे दर्जनों लोगों की चीखें एक साथ घुली हुई थीं। किसी के रोने की आवाज, किसी के मदद के लिए पुकारने की आवाज और किसी की दर्द भरी चीख। कबीर ने आंखें कसकर बंद कर लीं।
कुछ सेकंड बाद जब उसने आंखें खोलीं, तो बस अब भी वहीं खड़ी थी। लेकिन उसके अंदर बैठे सभी यात्री अपनी सीटों से उठ चुके थे। वे एक-एक करके दरवाजे की तरफ बढ़ रहे थे और सबसे आगे वही दूसरा कबीर खड़ा था।
वह बस से नीचे उतरा। उसके जूते पानी में पड़े, लेकिन पानी में कोई लहर नहीं बनी। कबीर ने ध्यान से देखा तो उसके जूते पानी को छू तो रहे थे, लेकिन पानी पर उसका कोई प्रतिबिंब नहीं था। दूसरा कबीर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। हर कदम के साथ उसके चेहरे की मुस्कान थोड़ी और चौड़ी होती जा रही थी।
अब दोनों के बीच सिर्फ पांच कदम का फासला था। दूसरे कबीर ने रुककर उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज में कहा, “मैं भी एक रात यहां कहानी बनाने आया था। मैंने भी सोचा था कि यह सिर्फ एक अफवाह है। मैंने भी कैमरा लगाया था। मैंने भी उस लड़की से सवाल किया था।”
कबीर के होंठ कांपने लगे। उसने किसी तरह पूछा, “तुम कौन हो?”
दूसरा कबीर मुस्कुराया। कुछ पल तक वह उसे देखता रहा और फिर बोला, “मैं वह हूं जो तुम बनोगे।”
कबीर पीछे हट गया। दूसरे कबीर ने अपनी उंगली उसकी तरफ उठाई और कहा, “मैं तुम्हारा अगला कल हूं।”
कबीर का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने सिर हिलाते हुए कहा, “यह झूठ है।”
दूसरा कबीर कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “काश।”
कबीर ने उसे घूरते हुए पूछा, “तुम मेरे जैसे कैसे दिखते हो?”
दूसरे कबीर की मुस्कान गायब हो गई। उसने धीमे से कहा, “क्योंकि मैं तुम ही हूं।”
“नहीं!” कबीर चीख पड़ा।
उसी पल उसके पीछे कुछ गिरने की आवाज आई। कबीर पलटा तो उसका कैमरा जमीन पर पड़ा था। लेकिन कैमरा तो कुछ सेकंड पहले उसके कंधे पर था। उसने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया। कैमरा अपने आप चालू हो गया।
स्क्रीन पर लाइव रिकॉर्डिंग चल रही थी, लेकिन जो स्क्रीन पर दिखाई दे रहा था, वह सामने का दृश्य नहीं था। स्क्रीन में बस स्टॉप बिल्कुल खाली था। न बस थी, न लड़की और न दूसरा कबीर। सिर्फ कबीर अकेला खड़ा था और किसी अदृश्य चीज से बात कर रहा था।
कबीर ने स्क्रीन और अपने सामने खड़े दूसरे कबीर के बीच देखा। उसकी सांसें रुक गईं। उसने घबराकर पूछा, “यह कैसे हो सकता है?”
दूसरा कबीर मुस्कुराया और बोला, “कैमरा वही दिखाता है जो इस दुनिया में है।”
कबीर ने कांपते हुए पूछा, “और तुम?”
दूसरे कबीर ने बस की तरफ देखा और कहा, “मैं अभी तुम्हारी दुनिया का हिस्सा नहीं हूं।”
अचानक कैमरे के स्पीकर से एक आवाज आने लगी। यह आवाज आज की नहीं थी। वह बहुत पुरानी लग रही थी, जैसे किसी पुराने रिकॉर्डर से आ रही हो।
“अगर कोई यह कैमरा पाए…” आवाज कुछ सेकंड के लिए रुकी। फिर सुनाई दिया, “तो उस बस का इंतजार मत करना…”
रिकॉर्डिंग में खरखराहट हुई। इसके बाद एक टूटी हुई आवाज फुसफुसाई, “वह यात्रियों को नहीं…”
कुछ पल तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।
फिर आखिरी शब्द साफ सुनाई दिया—“यादों को ले जाती है…”
कबीर के हाथ से कैमरा लगभग छूट गया।
उसी समय उसकी नजर बस स्टॉप की जंग लगी बेंच पर गई। वहां कई नाम खुदे हुए थे। कुछ इतने पुराने थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था। लेकिन सबसे नीचे एक नाम बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था, जैसे उसे अभी-अभी किसी ने चाकू से खरोंचकर लिखा हो।
कबीर मेहरा।
उसके नीचे एक तारीख थी।
6 अगस्त।
कबीर की सांसें तेज हो गईं। उसने अपनी घड़ी देखने की कोशिश की, लेकिन घड़ी बंद थी। उसने मोबाइल देखा, वह भी बंद था। तभी उसे याद आया कि वह देवगढ़ कब पहुंचा था।
6 अगस्त।
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“नहीं…” उसके मुंह से सिर्फ इतना निकला।
उसने बेंच को छुआ। लकड़ी बर्फ जैसी ठंडी थी।
तभी उसके पीछे लड़की की आवाज आई, “तुम्हें अब समझ आया?”
कबीर ने पलटकर देखा। सफेद रेनकोट वाली लड़की उसके पीछे खड़ी थी। इस बार उसके हाथ में छाता नहीं था। उसका चेहरा पहले से ज्यादा साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन वहां आंखें नहीं थीं। सिर्फ दो गहरे काले खाली गड्ढे थे।
कबीर पीछे हट गया और पूछा, “तुम कौन हो?”
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ पूछा, “अगर बस कभी आई ही नहीं… तो इतने लोग उसका इंतजार क्यों करते हैं?”
कबीर चुप रहा।
लड़की ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाया। उसकी हथेली बर्फ जैसी ठंडी थी। उसने कहा, “चलो।”
कबीर ने हाथ पीछे खींच लिया और पूछा, “कहां?”
लड़की पहली बार मुस्कुराई। उसने कहा, “जहां तुम पहले भी जा चुके हो।”
कबीर की आंखें फैल गईं। उसने कहा, “मैं कभी यहां से गया ही नहीं।”
लड़की ने उसकी तरफ देखा और बहुत शांत आवाज में कहा, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है।”
अचानक दूर कहीं मुर्गे की आवाज सुनाई दी। कबीर ने आसमान की तरफ देखा। काले बादलों के पीछे हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी। सुबह होने वाली थी।
लड़की ने बस की तरफ देखा। दूसरा कबीर अब भी दरवाजे के पास खड़ा था। उसने धीरे से कहा, “समय खत्म हो रहा है।”
बस की लाइटें एक-एक करके बुझने लगीं। पहले पीछे की लाइट, फिर बीच की और आखिर में सबसे आगे की।
कबीर ने पलक झपकी।
अगले ही पल सब कुछ गायब था।
न बस थी, न लड़की और न दूसरा कबीर।
सिर्फ पुराना बस स्टॉप, भीगी हुई सड़क और सुबह की ठंडी हवा बची थी।
कबीर कुछ समझ पाता, उससे पहले उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह वहीं बेंच के पास गिर पड़ा।
जब उसकी आंखें खुलीं तो आसपास कई लोग खड़े थे। पुलिस अधिकारी उसे उठाने की कोशिश कर रहा था और जमुना देवी कुछ दूरी पर खड़ी उसे डर भरी नजरों से देख रही थीं।
पुलिस अधिकारी ने पूछा, “सुन सकते हो?”
कबीर ने धीरे से आंखें खोलीं और पूछा, “मैं यहां कितनी देर से हूं?”
अधिकारी ने अपनी घड़ी देखी। “सुबह के छह बज रहे हैं।”
कबीर ने तुरंत पूछा, “बस?”
पुलिस अधिकारी ने हैरानी से कहा, “कौन सी बस?”
कबीर कुछ बोल नहीं पाया।
उसके हाथ में अब भी कैमरा था। पुलिस ने कैमरा लेकर रिकॉर्डिंग देखी।
वीडियो में रात के ठीक 11:40 बजे कबीर बस स्टॉप के सामने खड़ा दिखाई दे रहा था। उसके सामने कुछ भी नहीं था। न लड़की, न बस और न कोई दूसरा आदमी।
फिर अचानक कबीर ने अपना सिर घुमाया, जैसे किसी ने उसे आवाज दी हो। उसने हवा में हाथ उठाया, मुस्कुराया और धीरे-धीरे सड़क की तरफ बढ़ने लगा।
फिर कैमरे की स्क्रीन कुछ सेकंड के लिए काली हो गई।
जब तस्वीर वापस आई तो कबीर वहां नहीं था।
सिर्फ खाली सड़क दिखाई दे रही थी।
पूरे सात मिनट तक कैमरा उसी खाली सड़क को रिकॉर्ड करता रहा।
फिर अचानक कबीर दोबारा दिखाई दिया।
लेकिन इस बार उसकी चाल बदल चुकी थी।
वह बहुत धीरे-धीरे कैमरे के पास आया। उसने कैमरा उठाया और कुछ सेकंड तक सीधे लेंस में देखता रहा।
फिर वह मुस्कुराया और बहुत धीमी आवाज में बोला, “अगले शुक्रवार…”
वह कुछ पल रुका।
“11:40…”
फिर उसने कैमरे के बिल्कुल पास आकर फुसफुसाया, “एक सीट फिर खाली होगी।”
वीडियो वहीं समाप्त हो गया।
पुलिस ने कई बार वह रिकॉर्डिंग देखी, लेकिन किसी को समझ नहीं आया कि उन सात मिनटों में क्या हुआ था।
कबीर के लिए असली डर हालांकि उस रात के बाद शुरू हुआ।
उसने अगले ही दिन अपनी नौकरी छोड़ दी। कैमरा हमेशा के लिए बंद कर दिया और देवगढ़ छोड़कर शहर वापस आ गया। उसने किसी से उस रात के बारे में बात नहीं की।
लेकिन उसके बाद एक अजीब बात होने लगी।
हर शुक्रवार रात ठीक 11:40 बजे उसके घर की सारी घड़ियां एक साथ रुक जातीं। मोबाइल की स्क्रीन अचानक काली हो जाती और खिड़की के बाहर उसे कभी-कभी दूर से बस की हेडलाइट दिखाई देती।
वह तुरंत पर्दे बंद कर देता, कमरे की बत्ती बुझा देता और बिस्तर पर चुपचाप लेट जाता।
लेकिन कुछ मिनट बाद उसके दरवाजे पर हमेशा तीन दस्तक होतीं।
ठक।
ठक।
ठक।
पहली बार उसने सोचा कि शायद कोई पड़ोसी होगा। दूसरी बार उसने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन बाहर कोई नहीं था।
तीसरी बार दरवाजे के नीचे से पानी अंदर आया।
बारिश का पानी।
और उस पानी के साथ एक छोटी-सी काली टिकट भी अंदर सरक आई।
उस पर सिर्फ एक चीज लिखी थी।
11:40
कबीर ने वह टिकट फाड़कर फेंक दी।
लेकिन अगले शुक्रवार वही टिकट फिर उसके कमरे में पड़ी थी।
धीरे-धीरे उसने घर से बाहर निकलना भी बंद कर दिया।
लोग कहते हैं कि कबीर आज भी जिंदा है, लेकिन वह पहले जैसा इंसान नहीं रहा। कभी-कभी वह अचानक कमरे के दरवाजे की तरफ देखने लगता है, जैसे किसी के आने का इंतजार कर रहा हो।
अगर कोई उससे पूछता कि वह किसका इंतजार कर रहा है, तो वह पहले कुछ नहीं कहता।
फिर कुछ सेकंड बाद धीमी आवाज में जवाब देता है, “मुझे नहीं पता।”
और उसके बाद हमेशा एक ही बात कहता है।
“शायद मुझे लेने कोई आने वाला है।”
लेकिन इस कहानी का सबसे डरावना हिस्सा अभी खत्म नहीं हुआ है।
देवगढ़ के उस पुराने बस स्टॉप पर आज भी एक जंग लगा टाइम-टेबल लगा हुआ है। उसमें आखिरी बस का समय अब भी लिखा है।
11:40 PM
स्थानीय रिकॉर्ड के अनुसार उस सड़क पर पिछले बत्तीस वर्षों से कोई बस नहीं चली।
फिर भी बरसात की कुछ रातों में लोग दूर पहाड़ी सड़क पर दो पीली हेडलाइट्स दिखाई देने की बात कहते हैं।
एक पुरानी बस धीरे-धीरे धुंध से बाहर आती है और बस स्टॉप के सामने आकर रुक जाती है। उसका दरवाजा अपने आप खुलता है।
अंदर घना अंधेरा होता है।
फिर बस के भीतर से एक आवाज आती है, “जल्दी कीजिए।”
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद वही आवाज पहले से धीमी होकर कहती है—
“आपकी सीट आपका इंतजार कर रही है।”
और अगर उस रात कोई बस स्टॉप के पास खड़ा हो, तो कभी-कभी ड्राइवर की सीट पर एक आदमी दिखाई देता है।
काली जैकेट।
छोटी दाढ़ी।
कंधे पर पुराना कैमरा।
लोग कहते हैं कि वह कबीर जैसा दिखता है।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि वह हर बार बस स्टॉप की तरफ देखकर मुस्कुराता है।
फिर अपनी घड़ी में समय देखता है।
11:40 PM.
और बस का दरवाजा खोल देता है।
क्योंकि शायद उस बस में यात्रियों की सीटें कभी खत्म नहीं होतीं।
सिर्फ…
इंतजार करने वाले लोग बदलते रहते हैं।
कहानी समाप्त
अगर “बारिश वाली रात का बस स्टॉप” की यह कहानी आपको पसंद आई हो, तो इसे किसी ऐसे दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जिसे रहस्यमयी और डरावनी कहानियां पढ़ना पसंद है।
ऐसी ही Hindi Horror Stories, Mystery Stories और Suspense Stories पढ़ने के लिए My Hindi Stories से जुड़े रहें।
और अगली बार अगर रात के 11:40 बजे आपके घर के बाहर किसी पुरानी बस की आवाज सुनाई दे, तो खिड़की खोलने से पहले एक बार जरूर सोचिएगा।
क्योंकि हो सकता है…
वह बस आपको लेने आई हो।
ऐसी और डरावनी कहानियां पढ़ें
अगर बारिश वाली रात का बस स्टॉप की यह रहस्यमयी कहानी आपको पसंद आई, तो हमारी दूसरी Hindi Horror Stories, Mystery Stories और Suspense Stories भी जरूर पढ़ें।
कहानी को किसी ऐसे दोस्त के साथ शेयर करें जिसे डरावनी और रहस्यमयी कहानियां पढ़ना पसंद है।
👉 और भी Hindi Horror Stories पढ़ें
👉 My Hindi Stories की नई कहानियां पढ़ते रहें
और याद रखिए…
अगर कभी रात के 11:40 बजे आपके घर के बाहर किसी पुरानी बस के रुकने की आवाज आए, तो दरवाजा खोलने से पहले एक बार जरूर सोचिएगा।
क्योंकि हो सकता है…
इस बार खाली सीट आपके लिए हो।
यह एक काल्पनिक हॉरर और रहस्य कहानी है, जिसे मनोरंजन के उद्देश्य से लिखा गया है। कहानी के पात्र, घटनाएं और अलौकिक प्रसंग काल्पनिक हैं।


