अगस्त की इस भीगी हुई शाम में दिल्ली का ट्रैफिक हमेशा की तरह रेंग रहा था। कार के शीशे पर बारिश की बूंदें एक-दूसरे से मिलकर नीचे फिसल रही थीं। एफएम रेडियो पर कोई पुराना सा गीत बज रहा था, जिसे मैंने बहुत पहले अपनी प्लेलिस्ट से हटा दिया था।
शायद हर Hindi Love Story की तरह हमारी कहानी की शुरुआत भी किसी खूबसूरत जगह या किसी फिल्मी मुलाकात से नहीं हुई थी। हमारी कहानी शुरू हुई थी नोएडा के एक को-वर्किंग स्पेस में—एक्सेल शीट्स, डेडलाइन्स और कॉफी मशीन के खराब होने की शिकायतों के बीच।
मैंने गहरी सांस ली और डैशबोर्ड से सनग्लासेस निकालने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी मेरी उंगलियों से एक पुराना, मुड़ा हुआ मेट्रो कार्ड टकराया।
यह मेरा कार्ड नहीं था। इसके पीछे नीले मार्कर से एक छोटा सा स्माइली बना हुआ था।
यह श्रुति का कार्ड था।
वक्त कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो, जब हम राजीव चौक के उस भारी हुजूम में एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़े हुए चलते थे। हमारी कहानी किसी फिल्मी सेट पर या किसी खूबसूरत पहाड़ी वादियों में शुरू नहीं हुई थी। हमारी कहानी शुरू हुई थी नोएडा के एक को-वर्किंग स्पेस में, एक्सेल शीट्स, डेडलाइन्स और कॉफी मशीन के खराब होने की शिकायतों के बीच।
श्रुति वैसी लड़की नहीं थी जो पहली नजर में किसी को अपना दीवाना बना दे। वह शांत थी, अपने काम से काम रखने वाली, और हमेशा अपने बालों को एक रबर बैंड में बांध कर रखने वाली। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी—कुछ कर गुजरने की, अपने छोटे से शहर से निकलकर इस बड़े शहर में अपनी पहचान बनाने की।
हमारी पहली लंबी बातचीत ऑफिस की कैब में हुई थी, जब भयंकर बारिश के कारण हम दोनों तीन घंटे तक ट्रैफिक में फंसे रह गए थे। उस दिन मैंने जाना कि वह बाहर से जितनी सख्त दिखती है, अंदर से उतनी ही कोमल है। हमने अपनी पसंदीदा किताबों से लेकर बचपन की अजीबोगरीब आदतों तक, हर बात शेयर की। उस दिन के बाद, वह कैब की सफर हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा बन गया।
दोस्ती कब प्यार में बदल गई, हमें खुद पता नहीं चला। यह कोई जादुई पल नहीं था जहाँ हवाएं चलने लगी हों या गिटार बजने लगा हो। यह बहुत ही स्वाभाविक था। जैसे सर्दियों में धीरे-धीरे धूप का अहसास होता है, वैसे ही श्रुति मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई।
हमारा प्यार बिल्कुल आम लोगों जैसा था। हम महंगे रेस्टोरेंट में जाने के बजाय, वीकेंड्स पर पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में स्ट्रीट फूड खाते थे। हम इंडिया गेट पर बैठकर घंटों भविष्य की बातें करते थे। हमारा सपना बहुत साधारण था—एक 2BHK फ्लैट, जिसकी बालकनी में कुछ पौधे हों, और रविवार की सुबह हम दोनों साथ मिलकर चाय बनाएं। श्रुति अक्सर कहती थी, “कबीर, मुझे दुनिया नहीं घूमनी, बस अपने हिस्से का एक छोटा सा आसमान चाहिए, जिसमें हम दोनों सुकून से उड़ सकें।”
शुरुआती दो साल किसी खूबसूरत सपने की तरह बीते। लेकिन फिर जिंदगी ने अपना असली रूप दिखाना शुरू किया।
मुझे एक स्टार्टअप में अच्छी पोजिशन मिल गई, और श्रुति को भी उसकी कंपनी में प्रमोशन मिला। शुरुआत में हमने इसे साथ मिलकर सेलिब्रेट किया। हमें लगा कि हम अपने सपनो के करीब पहुँच रहे हैं। लेकिन हम यह नहीं समझ पाए कि सफलता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते हम अनजाने में एक-दूसरे का हाथ छोड़ रहे थे।
जिम्मेदारियां बढ़ने लगीं। मेरी शिफ्ट्स लंबी हो गईं और श्रुति पर क्लाइंट मीटिंग्स का दबाव बढ़ गया। हमारी जो शामें पहले मेट्रो स्टेशन पर एक-दूसरे का इंतजार करते हुए बीतती थीं, वो अब लैपटॉप की स्क्रीन के सामने बीतने लगीं।
“कबीर, आज मैं लेट हो जाऊंगी, तुम खाना खा लेना,” श्रुति के ये मैसेज अब रोज की बात हो गए थे। “कोई बात नहीं, मेरी भी एक कॉल है। टेक केयर,” मेरा भी यही रटा-रटाया जवाब होता था।
हमारे बीच कोई बड़ी लड़ाई नहीं हुई। कोई तीसरा इंसान हमारे बीच नहीं आया। कोई धोखा नहीं था। हमारे रिश्ते को किसी की नजर नहीं लगी थी, बस वक्त की धूल जमने लगी थी।
हम दोनों एक ही शहर में, कभी-कभी एक ही कमरे में होते थे, लेकिन हमारे बीच हजारों मीलों का फासला आ चुका था। जब हम मिलते, तो हमारे पास बात करने के लिए कुछ नहीं होता था। वो ऑफिस की गॉसिप्स, वो भविष्य के सपने, वो बेमतलब की हंसी—सब कुछ जैसे कहीं गायब हो गया था। हमारी बातचीत अब सिर्फ “बिल भर दिया?”, “ग्रोसरी लानी है”, और “आज बहुत थकान है” तक सिमट कर रह गई थी।
मुझे याद है, वो हमारी एनिवर्सरी का दिन था। मैंने बहुत मुश्किल से ऑफिस से छुट्टी ली थी और श्रुति के लिए डिनर प्लान किया था। मैं रेस्टोरेंट में उसका इंतजार कर रहा था। एक घंटा, दो घंटे… और फिर उसका फोन आया।
“कबीर, आई एम सो सॉरी। एक इंटरनेशनल क्लाइंट का अप्रूवल आ गया है और मुझे अभी ऑफिस में ही रुकना पड़ेगा। प्लीज मुझे माफ कर दो।” उसकी आवाज में थकान और बेबसी थी।
मुझे उस पर गुस्सा नहीं आया। मुझे रोना भी नहीं आया। मुझे बस एक अजीब सा खालीपन महसूस हुआ। मैंने वेटर को बुलाकर बिल पे किया और अकेले ही वहां से निकल गया। उस रात जब श्रुति घर आई, तो मैं जाग रहा था। वो मेरे पास बैठी और मेरे कंधे पर सिर रखकर चुपचाप रोने लगी। मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसके बालों पर हाथ फेरता रहा।
उस रात हमें एहसास हुआ कि प्यार होना और एक साथ खुश रहना, दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
कभी-कभी आप एक इंसान से बेइंतहा प्यार करते हैं, लेकिन आपके रास्ते इतने अलग हो चुके होते हैं कि आप एक-दूसरे की जिंदगी में खुशियों से ज्यादा रुकावट बनने लगते हैं। हम दोनों महत्वकांक्षी थे। हम दोनों जिंदगी में कुछ हासिल करना चाहते थे, लेकिन उस दौड़ में हम एक-दूसरे को खो चुके थे।
अगले महीने का वो रविवार मुझे आज भी याद है। हमने बालकनी में बैठकर साथ में चाय पी। कोई जल्दबाजी नहीं थी, कोई लैपटॉप खुला नहीं था। उस दिन हम बहुत देर तक शांत रहे।
“हम ये क्या कर रहे हैं कबीर?” श्रुति ने अचानक खामोशी को तोड़ते हुए कहा। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन आवाज शांत थी।
“हम कोशिश कर रहे हैं श्रुति, एक ऐसे रिश्ते को जिंदा रखने की, जिसकी सांसें बहुत पहले टूट चुकी हैं,” मैंने कॉफी का कप नीचे रखते हुए कहा। मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया था।
“मैं तुमसे प्यार करती हूँ कबीर। बहुत ज्यादा।” उसके आंसू गालों पर फिसलने लगे थे।
“मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ श्रुति। और शायद इसीलिए… हमें अब एक-दूसरे को आजाद कर देना चाहिए। इससे पहले कि ये फासले हमारी इज्जत को भी खत्म कर दें और हम एक-दूसरे से नफरत करने लगें।”
वो रोती रही, और मैं भी। हम गले लगे, शायद आखिरी बार एक-दूसरे को उस तरह से महसूस करने के लिए। कोई चीख-पुकार नहीं हुई, कोई इल्जाम नहीं लगाए गए। दो समझदार लोगों ने एक बहुत ही दर्दनाक, लेकिन जरूरी फैसला लिया था।
कुछ हफ्तों बाद श्रुति बैंगलोर शिफ्ट हो गई, एक नई नौकरी, एक नई शुरुआत के लिए। मैंने उसे एयरपोर्ट पर ड्रॉप किया था। जाते हुए उसने मुझे मुड़कर देखा था, मुस्कुराई थी, और भीड़ में गायब हो गई थी।
आज इस बात को तीन साल हो चुके हैं।
पीछे से आ रही एक कार के हॉर्न ने मुझे मेरे ख्यालों से बाहर निकाला। ट्रैफिक थोड़ा आगे बढ़ चुका था। मैंने उस मुड़े हुए मेट्रो कार्ड को वापस डैशबोर्ड में संभाल कर रख दिया।
लोग कहते हैं कि सच्चा प्यार वो है जो हर हाल में साथ रहे। लेकिन मेरा मानना है कि कभी-कभी सच्चा प्यार वो होता है, जिसमें आप दूसरे इंसान की खुशी के लिए पीछे हट जाते हैं। हम साथ नहीं हैं, लेकिन हमारे बीच कोई कड़वाहट भी नहीं है। मैं आज भी जब चाय बनाता हूँ, तो मुझे उसकी याद आती है। मुझे पता है कि वो भी बैंगलोर की किसी बालकनी में खड़ी होकर कभी-कभी उस 2BHK फ्लैट के सपने को याद करती होगी।
हम दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं। हम सफल हैं, हम व्यस्त हैं। हमने वो सब पा लिया है जिसके लिए हमने दौड़ लगाई थी। बस… उस दौड़ में हम पीछे छूट गए।
कहानी का अंत हमेशा ‘हैप्पीली एवर आफ्टर’ नहीं होता। कुछ कहानियां बस पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं। और शायद यही उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती है।


