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बारिश वाली रात का बस स्टॉप | Part 1

Posted on August 11, 2026 by My Hindi Stories

बारिश की रात सुनसान बस स्टॉप पर रहस्यमयी लड़की और कबीर, पीछे खड़ी डरावनी बस का दृश्य

बारिश वाली रात का बस स्टॉप सिर्फ एक सुनसान जगह की कहानी नहीं है। उत्तराखंड के छोटे से कस्बे देवगढ़ में मौजूद इस पुराने बस स्टॉप पर हर रात ठीक 11:40 बजे एक रहस्यमयी लड़की दिखाई देती है। वह हर आने-जाने वाले से सिर्फ एक सवाल पूछती है—“आखिरी बस कितने बजे आएगी?”

कहते हैं कि जो भी उस सवाल का जवाब देता है, उसकी जिंदगी फिर कभी पहले जैसी नहीं रहती।

जब युवा रेडियो पत्रकार कबीर इस रहस्य की सच्चाई जानने के लिए पूरी रात उसी बस स्टॉप पर रुकता है, तो उसे एक ऐसी लड़की दिखाई देती है जिसे उसकी आंखें देख सकती हैं, लेकिन उसका कैमरा नहीं।

और फिर आती है वह बस…

एक ऐसी बस, जो रात नौ बजे के बाद इस रास्ते पर चलती ही नहीं।

लेकिन सबसे खौफनाक बात तब सामने आती है जब कबीर बस के अंदर अपनी ही शक्ल वाले एक दूसरे इंसान को देखता है।

आखिर वह रहस्यमयी लड़की कौन है? रात 11:40 बजे आने वाली बस का राज क्या है? और बस में बैठा दूसरा कबीर कौन है?

पढ़िए बारिश वाली रात का बस स्टॉप Part 1, एक रहस्यमयी Hindi Horror Story जो आपको आखिरी पैराग्राफ तक बांधे रखेगी।

बारिश कभी सिर्फ मौसम नहीं लाती।

कभी-कभी वह अपने साथ ऐसी आवाज़ें लेकर आती है, जिन्हें सुनने के बाद इंसान रात में अकेला सो नहीं पाता।

ऐसी ही एक रात थी।

उत्तराखंड के एक छोटे से कस्बे में लगातार बारिश हो रही थी। सड़कें खाली थीं, जंगल खामोश था और शहर से करीब पाँच किलोमीटर दूर एक पुराने बस स्टॉप पर हर रात ठीक 11:40 बजे कोई किसी का इंतज़ार करता था।

लेकिन सबसे डरावनी बात यह नहीं थी कि वहाँ कौन इंतज़ार करता था।

डरावनी बात यह थी कि जो भी उस अजनबी के सवाल का जवाब देता था, उसकी जिंदगी कभी पहले जैसी नहीं रहती थी।

देवगढ़ का रहस्यमयी बस स्टॉप

उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा कस्बा था—देवगढ़।

दिन के समय देवगढ़ किसी तस्वीर की तरह खूबसूरत लगता था। चारों तरफ घने देवदार के जंगल, पहाड़ों के बीच से गुजरती घुमावदार सड़कें, बादलों में छिपी चोटियाँ और सुबह-सुबह पहाड़ियों से उतरती ठंडी धुंध इस जगह को बेहद खूबसूरत बनाती थीं।

लेकिन रात होते ही यही खूबसूरत कस्बा अजीब-सा खामोश हो जाता था।

शाम सात बजे के बाद बाजार खाली होने लगता। आठ बजे तक ज्यादातर दुकानें बंद हो जातीं और रात नौ बजे के बाद लोग बिना किसी जरूरी काम के घर से बाहर निकलना पसंद नहीं करते थे।

इस डर की वजह कोई जंगली जानवर नहीं था।

वजह थी कस्बे से लगभग पाँच किलोमीटर दूर बना एक पुराना बस स्टॉप।

वह बस स्टॉप कई सालों से इस्तेमाल में था, लेकिन अब उसकी हालत बेहद खराब हो चुकी थी। टूटी हुई टीन की छत, जंग लगी लोहे की बेंच, दीवार पर आधा फटा हुआ टाइम-टेबल और उसके पीछे फैला हुआ घना जंगल।

दिन में वहाँ से बसें गुजरती थीं।

लेकिन रात नौ बजे के बाद उस रास्ते पर कोई बस नहीं चलती थी।

फिर भी स्थानीय लोगों का कहना था कि हर रात ठीक 11:40 बजे उस बस स्टॉप पर एक लड़की दिखाई देती थी।

वही सफेद रेनकोट।

वही पुराना काला छाता।

और वही सवाल।

“आखिरी बस कितने बजे आएगी?”

लोग कहते थे कि अगर कोई उसे जवाब दे दे, तो उसके बाद कुछ ऐसा होता था जिसे वह जिंदगी भर भूल नहीं पाता।

किसी ने कहा था कि जवाब देने के बाद उसे हर रात अपने घर के बाहर बस रुकने की आवाज सुनाई देती थी।

किसी ने दावा किया कि उसने अपने कमरे की खिड़की में उसी लड़की को खड़ा देखा था।

और एक आदमी, जिसने कथित तौर पर उस लड़की को जवाब दिया था, अगली सुबह बस स्टॉप से कुछ किलोमीटर दूर मिला था।

वह जिंदा था।

लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की।

कबीर को भूतों पर विश्वास नहीं था

कबीर, उम्र लगभग अट्ठाईस साल, एक युवा रेडियो पत्रकार था।

उसका काम ही ऐसी रहस्यमयी घटनाओं की पड़ताल करना था। पुरानी हवेलियां, गुमशुदा लोगों की कहानियां, जंगलों में सुनाई देने वाली अजीब आवाजें और स्थानीय लोगों की डरावनी लोककथाएं उसके रेडियो कार्यक्रम का हिस्सा थीं।

लेकिन कबीर को भूतों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था।

उसका एक ही सिद्धांत था।

“हर डर के पीछे कोई न कोई सच छिपा होता है।”

जब उसे देवगढ़ के उस बस स्टॉप की कहानी के बारे में पता चला, तो उसने इसे अपने अगले रेडियो शो का विषय बना लिया।

उसने सोचा कि अगर कहानी झूठी है, तो लोगों के अंधविश्वास का सच सामने आएगा।

और अगर कहानी में कुछ सच्चाई है, तो शायद उसे पहली बार कोई ऐसा सबूत मिल जाएगा जिसे नकारना मुश्किल होगा।

देवगढ़ पहुंचने के अगले दिन उसने कई स्थानीय लोगों से बात की।

लेकिन जैसे ही वह बस स्टॉप का नाम लेता, लोगों के चेहरे बदल जाते।

एक दुकानदार ने बात करने से साफ इनकार कर दिया।

एक टैक्सी ड्राइवर ने कहा, “साहब, दिन में जाइए। रात में नहीं।”

कबीर हंस पड़ा।

“क्यों? रात में बस स्टॉप भूतों की प्राइवेट प्रॉपर्टी है क्या?”

ड्राइवर उसकी तरफ देखता रहा।

वह नहीं हंसा।

उसने बस इतना कहा, “मजाक मत कीजिए।”

शाम को कबीर एक पुराने मकान के बाहर बैठी बुजुर्ग महिला से मिला। उसका नाम जमुना देवी था।

कबीर ने रिकॉर्डर निकाला और पूछा, “आपने उस बस स्टॉप के बारे में सुना है?”

महिला के हाथ अचानक रुक गए।

कुछ सेकंड तक वह चुप रही।

फिर उसने धीमी आवाज में पूछा, “तुम वहाँ जाने वाले हो?”

“हाँ।”

“आज रात?”

“हाँ।”

महिला ने उसकी आंखों में देखा।

उसकी आवाज अब पहले से भी धीमी थी।

“तो मेरी एक बात याद रखना।”

कबीर ने रिकॉर्डर उसकी तरफ कर दिया।

“क्या?”

बुजुर्ग महिला थोड़ा झुककर बोली, “अगर वहाँ कोई लड़की तुमसे पूछे कि आखिरी बस कितने बजे आएगी, तो उसे जवाब मत देना।”

कबीर मुस्कुराया।

“और अगर उसने दोबारा पूछा?”

महिला ने तुरंत जवाब दिया, “तब भी नहीं।”

“और अगर तीसरी बार पूछे?”

जमुना देवी का चेहरा अचानक सख्त हो गया।

“तब वहाँ से भाग जाना।”

कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

“क्यों?”

बुजुर्ग महिला ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।

फिर बोली, “क्योंकि तीसरी बार वह सवाल नहीं पूछती।”

वह कुछ पल के लिए रुकी।

“फिर वह तुम्हारा नाम पूछती है।”

रात 11:18

कबीर ने उस रात अपना कैमरा, ऑडियो रिकॉर्डर, टॉर्च और मोबाइल बैग में रखा।

रात करीब 10:30 बजे वह बस स्टॉप पहुंच गया।

बारिश शुरू हो चुकी थी।

पहाड़ों में बारिश की आवाज शहर की बारिश से अलग होती है।

यहाँ पानी सिर्फ छत पर नहीं गिरता। वह पेड़ों से टकराता है, चट्टानों से टकराता है, जंगल के भीतर गूंजता है और कई बार ऐसा लगता है जैसे कोई आपके बिल्कुल पीछे चल रहा हो।

कबीर ने बस स्टॉप के अंदर कैमरा लगाया।

फिर घड़ी देखी।

11:18 PM.

“अभी बाईस मिनट बाकी हैं,” उसने कैमरे के सामने कहा।

“देखते हैं देवगढ़ की यह मशहूर कहानी सच है या सिर्फ एक अफवाह।”

उसने रिकॉर्डिंग शुरू की।

बारिश तेज हो रही थी।

हवा भी।

लेकिन आसपास कोई इंसान नहीं था।

11:27 PM.

कुछ नहीं हुआ।

11:31 PM.

सिर्फ बारिश।

11:35 PM.

दूर कहीं कुत्ता भौंका।

फिर अचानक चुप हो गया।

कबीर ने रिकॉर्डर उठाया।

“अजीब है।”

उसने आसपास देखा।

“अभी कुछ सेकंड पहले कुत्ते की आवाज आ रही थी।”

फिर उसे लगा जैसे जंगल के अंदर किसी ने धीरे से कुछ कहा।

कबीर ने टॉर्च उस दिशा में घुमाई।

कुछ नहीं।

सिर्फ पेड़।

वह खुद से बोला, “दिमाग खेल कर रहा है।”

फिर उसने रिकॉर्डर की तरफ देखा।

और उसी पल रिकॉर्डर की स्क्रीन पर लाल लाइट अपने आप जल उठी।

रिकॉर्डिंग चालू थी।

कबीर ने उसे बंद करने की कोशिश की।

बटन काम नहीं कर रहा था।

फिर स्पीकर से खरखराहट की आवाज आने लगी।

पहले बहुत धीमी।

फिर तेज।

“श्श्श्श्श…”

कबीर ने रिकॉर्डर कान के पास किया।

बारिश के शोर के बीच उसे किसी की फुसफुसाहट सुनाई दी।

बहुत धीमी।

लेकिन बिल्कुल साफ।

“वह आ रही है…”

कबीर का चेहरा गंभीर हो गया।

उसने तुरंत पीछे देखा।

कोई नहीं था।

उसने टॉर्च चारों तरफ घुमाई।

खाली सड़क।

जंगल।

बारिश।

फिर रिकॉर्डर से दोबारा आवाज आई।

इस बार पहले से करीब।

“वह आ गई…”

कबीर ने धीरे-धीरे अपनी घड़ी की तरफ देखा।

11:40 PM.

उसी क्षण सड़क के दूसरी तरफ अंधेरे में एक हल्की-सी आकृति दिखाई दी।

कबीर की सांस रुक गई।

एक लड़की।

सफेद रेनकोट।

हाथ में पुराना काला छाता।

वह सड़क के किनारे खड़ी थी।

बिल्कुल स्थिर।

कबीर ने कैमरा उठाया।

“क्या आप ठीक हैं?”

कोई जवाब नहीं।

लड़की ने धीरे-धीरे सड़क पार करनी शुरू की।

उसके कदमों की आवाज बारिश में भी साफ सुनाई दे रही थी।

छपाक।

छपाक।

छपाक।

वह बस स्टॉप के सामने आकर रुक गई।

अब वह कबीर से सिर्फ कुछ कदम दूर थी।

उसका चेहरा छाते के नीचे पूरी तरह छिपा हुआ था।

कुछ सेकंड तक दोनों के बीच सिर्फ बारिश बोलती रही।

फिर लड़की ने धीरे से कहा, “माफ कीजिए।”

कबीर का दिल जोर से धड़कने लगा।

लड़की ने सिर थोड़ा उठाया।

“आखिरी बस…”

एक लंबा विराम।

फिर उसने पूछा, “कितने बजे आएगी?”

कबीर को जमुना देवी की बात याद आई।

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

लड़की शांत रही।

फिर उसने पूछा, “आपने सुना नहीं?”

कबीर ने फिर भी चुप्पी साधे रखी।

उसने कैमरा उसकी तरफ कर दिया।

स्क्रीन पर नजर पड़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

कैमरे में लड़की थी ही नहीं।

जहाँ वह खड़ी थी, वहाँ सिर्फ खाली बस स्टॉप दिखाई दे रहा था।

लेकिन कबीर की आंखें उसे साफ देख रही थीं।

सफेद रेनकोट।

काला छाता।

भीगे हुए जूते।

सब कुछ।

वह घबराकर कैमरे और लड़की के बीच देखने लगा।

तभी लड़की ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “आप मुझे देख सकते हैं।”

कबीर जम गया।

लड़की ने कहा, “लेकिन कैमरा मुझे नहीं देख सकता।”

उसके हाथ कांपने लगे।

वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा।

लड़की ने कोई कदम नहीं उठाया।

बस वहीं खड़ी रही।

फिर उसने छाता नीचे कर दिया।

कबीर ने पहली बार उसका चेहरा देखा।

और उसकी सांस अटक गई।

वहाँ कोई चेहरा था ही नहीं।

न आंखें।

न नाक।

न कोई पहचान।

सिर्फ गहरा काला अंधेरा।

लेकिन उस अंधेरे के बीच एक लंबी मुस्कान उभर आई।

ऐसी मुस्कान जो इंसान की मुस्कान नहीं हो सकती थी।

कबीर पीछे हटते-हटते बेंच से टकरा गया।

कैमरा उसके हाथ से छूटकर जमीन पर गिर गया।

लड़की ने उसकी तरफ देखा।

फिर बस स्टॉप की दीवार पर लगे पुराने टाइम-टेबल की तरफ मुड़ गई।

उसकी उंगलियां कांप रही थीं।

वह बुदबुदाई, “आज भी देर हो गई।”

फिर थोड़ा जोर से बोली, “आज भी मैं नहीं पहुंच पाऊंगी।”

कबीर ने डरते हुए पूछा, “कहाँ?”

लड़की अचानक बिल्कुल शांत हो गई।

उसने उसकी तरफ चेहरा घुमाया।

फिर कहा, “घर।”

उसी समय दूर पहाड़ी सड़क पर दो पीली रोशनियां दिखाई दीं।

कबीर ने पलटकर देखा।

एक बस धुंध और बारिश को चीरती हुई उनकी तरफ आ रही थी।

उसका इंजन भारी आवाज कर रहा था।

कबीर की रीढ़ में ठंडक उतर गई।

क्योंकि वह जानता था।

रात नौ बजे के बाद इस रास्ते पर कोई बस नहीं चलती।

बस धीरे-धीरे बस स्टॉप के सामने आकर रुक गई।

उस पर कोई रूट नंबर नहीं था।

कोई कंपनी का नाम नहीं।

सिर्फ धूल से ढकी खिड़कियां।

और उन खिड़कियों के पीछे कुछ धुंधले चेहरे।

कबीर ने अपनी टॉर्च बस के अंदर डाली।

उसे सीटें दिखाई दीं।

कुछ लोग बैठे थे।

लेकिन उनमें से कोई हिल नहीं रहा था।

कोई बात नहीं कर रहा था।

जैसे सब किसी चीज का इंतजार कर रहे हों।

बस का दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

कर्क…

ड्राइवर अपनी सीट पर बैठा था।

उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।

कंडक्टर कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।

फिर भी बस के अंदर से आवाज आई।

“एक सीट अभी भी खाली है।”

कबीर ने पीछे देखा।

वह लड़की गायब थी।

अचानक उसे लगा कि शायद उसे भाग जाना चाहिए।

लेकिन तभी बस के अंदर से फिर आवाज आई।

“कबीर…”

वह जम गया।

उसने कभी उस लड़की को अपना नाम नहीं बताया था।

फिर बस के अंदर बैठे सभी लोगों ने एक साथ धीरे-धीरे अपना सिर उसकी तरफ घुमा दिया।

कबीर की सांस रुक गई।

वह एक कदम पीछे हटा।

फिर दूसरा।

लेकिन उसकी नजर बस की पहली सीट पर जाकर टिक गई।

वहाँ कोई बैठा था।

एक आदमी।

भीगा हुआ।

सिर झुकाए।

वही काली जैकेट।

वही जींस।

वही जूते।

कबीर ने अपनी तरफ देखा।

फिर उस आदमी की तरफ।

उसका मोबाइल उसकी जेब में था।

उसकी जैकेट वही थी।

उसके जूते वही थे।

फिर बस में बैठा वह आदमी कौन था?

अचानक उस आदमी ने अपना सिर उठाया।

धीरे-धीरे।

बहुत धीरे।

उसका चेहरा रोशनी में आया।

कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

वह खुद था।

बस में बैठा दूसरा कबीर उसे घूर रहा था।

फिर उसने होंठों पर एक हल्की मुस्कान लाई।

और बहुत धीमी आवाज में कहा।

“तुम इतनी देर से क्यों आए?”

कबीर के पीछे अचानक किसी ने उसके कान के बिल्कुल पास फुसफुसाया।

“क्योंकि आखिरी बस तुम्हारा इंतजार कर रही थी।”

कबीर ने पलटकर देखा।

सफेद रेनकोट वाली लड़की उसके ठीक पीछे खड़ी थी।

और इस बार उसके हाथ में छाता नहीं था।

उसके हाथ में कबीर का कैमरा था।

वही कैमरा जो कुछ सेकंड पहले जमीन पर गिरा था।

लड़की ने कैमरा उसकी तरफ बढ़ाया।

स्क्रीन पर लाइव रिकॉर्डिंग चल रही थी।

और स्क्रीन में कबीर बस स्टॉप पर अकेला नहीं था।

उसके पीछे दर्जनों लोग खड़े थे।

वे सभी उसे देख रहे थे।

और उन सबके चेहरे एक जैसे थे।

कबीर के चेहरे जैसे।

कबीर चीखना चाहता था।

लेकिन उसकी आवाज नहीं निकली।

बस का दरवाजा अब भी खुला था।

अंदर बैठा दूसरा कबीर मुस्कुरा रहा था।

फिर उसने धीरे से अपनी सीट के बगल वाली खाली सीट पर हाथ रखा।

और कहा, “बैठो।”

“तुम्हारी सीट खाली है।”

उसी पल बस की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।

अंधेरे में सिर्फ एक आवाज सुनाई दी।

“अगला स्टॉप…”

कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज फिर आई।

“देवगढ़ नहीं होगा।”

Part 1 समाप्त

क्या कबीर उस रहस्यमयी बस में कदम रखेगा?

बस में मौजूद दूसरा कबीर कौन है?

वह लड़की आखिर किसका इंतजार कर रही है?

और सबसे बड़ा सवाल…

अगर वह बस देवगढ़ नहीं जा रही थी, तो उसका अगला स्टॉप आखिर कहाँ था?

यह एक काल्पनिक हॉरर और रहस्य कहानी है, जिसे मनोरंजन के उद्देश्य से लिखा गया है। कहानी के पात्र, घटनाएं और अलौकिक प्रसंग काल्पनिक हैं।

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