उत्तर प्रदेश के कुंडलपुर गाँव में कुंडलपुर का भूतिया बरगद अपनी डरावनी कहानियों के लिए मशहूर है। रात के समय यह पुराना बरगद, धुंध और ठंडी हवा के बीच, टॉर्च पकड़े हुए किसी भी लड़के के सामने खड़ा हो सकता है। यह **भूतिया बरगद** डरावना और रहस्यमयी माहौल बनाता है।
कुंडलपुर के भूतिया बरगद का रहस्य
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव “कुंडलपुर” में यह पुराना भूतिया बरगद का पेड़ था। लोग कहते थे कि इस कुंडलपुर के बरगद के नीचे शाम के बाद रुकना मना है। गाँव के बुज़ुर्ग बताते थे कि वर्षों पहले इसी भूतिया पेड़ के पास एक अजीब हादसा हुआ था—और तब से वहाँ कोई भी रात में नहीं जाता था।
अनिरुद्ध की हिम्मत और भूतिया बरगद का सामना
लेकिन गाँव में रहने वाला 16 वर्षीय अनिरुद्ध कुंडलपुर के इस भूतिया बरगद की बातें मानने में विश्वास नहीं रखता था। उसे लगता था कि यह सब मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, जो लोग डर फैलाने के लिए कहते हैं।
एक दिन उसके दोस्तों ने उसे चुनौती दी—
“अगर तू सच में इतना बहादुर है, तो आज रात भूतिया बरगद के पास जाकर दिखा!”
अनिरुद्ध मुस्कुराया और बोला,
“ठीक है! मैं आज आधी रात कुंडलपुर के उस बरगद के पास जाऊँगा… अकेला।”
आधी रात का सफ़र और भूतिया बरगद का सच
रात होते ही गाँव के ज़्यादातर घरों में लाइटें बंद हो गईं। दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आती थी। अनिरुद्ध हाथ में टॉर्च लेकर बाहर निकला और कुंडलपुर के भूतिया बरगद की ओर चल पड़ा।
भूतिया बरगद के पास पहुँचते ही हवा एकदम ठंडी हो गई। अचानक पेड़ की सूखी डालियाँ हिलने लगीं—मानो कोई अदृश्य हाथ उन्हें झुला रहा हो। अनिरुद्ध ने टॉर्च ऊपर की ओर की… और महसूस किया कि वहाँ कोई परछाईं है।
लेकिन जैसे ही उसने ध्यान से देखा—कुछ भी नहीं था।
“शायद मेरा वहम है,” उसने खुद को समझाया।
“क्यों आया है…?”
उसी समय, उसके पीछे से धीमी आवाज़ आई—
“क्यों आया है…?”
अनिरुद्ध का दिल धड़क उठा।
उसने पीछे मुड़कर देखा—कोई नहीं था।
कुंडलपुर के इस भूतिया बरगद के नीचे अचानक धुआँ सा उठने लगा। धुआँ धीरे-धीरे एक आकृति में बदल रहा था—एक लंबी, काली परछाईं, जिसकी आँखें गहरे अँधेरे में भी लाल चमक रही थीं।

वह धीमी आवाज़ में बोली—
“जब कहा था… रात को इस भूतिया बरगद के पास मत आना… फिर क्यों आया?”
गाँव वालों की एंट्री और बचाव
अनिरुद्ध के पाँव सुन्न हो चुके थे। वह भूतिया बरगद से भागने की कोशिश करता है, लेकिन उसके कदम जैसे जमीन में धँस जाते हैं।
परछाईं पास आती जा रही थी। हवा में अजीब फुसफुसाहट—मानो हजारों कीड़े कुंडलपुर के इस डरावने बरगद की शाखाओं पर रेंग रहे हों।
अचानक दूर से लाइटें दिखीं—गाँव के लोग लाठी लेकर उसकी तलाश में आ रहे थे। परछाईं झटके से पीछे हट गई और धुएँ में बदलकर भूतिया बरगद की ऊपरी शाखाओं में समा गई।
गाँव वाले चिल्लाए,
“भाग अनिरुद्ध! पीछे मत देखना!”
अनिरुद्ध किसी तरह कुंडलपुर के उस भूतिया बरगद से दौड़कर घर पहुँचा। उसका चेहरा पीला था, और वह लगातार काँप रहा था।
कुंडलपुर के भूतिया बरगद से सीख
उस दिन के बाद वह कभी रात में अकेला बाहर नहीं निकला। कुंडलपुर के भूतिया बरगद की यह सच्ची घटना गाँव वालों के लिए एक सबक बन गई।
Moral of the Story (कहानी का संदेश)
हर चेतावनी का मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। कुंडलपुर के भूतिया बरगद जैसी जगहों के बारे में लोग अनुभव से बोलते हैं, और अनदेखा करने से खतरा बढ़ सकता है।
अगर कुंडलपुर के भूतिया बरगद की यह डरावनी हिंदी कहानी पसंद आई हो तो कमेंट में बताएं कि अगली बार किस तरह की डरावनी कहानी सुनना चाहेंगे।


