ये बात 2015 की है। मैं लखनऊ में इंजीनियरिंग कर रहा था। गर्मियों की छुट्टी में गाँव गया। हमारे गाँव के बाहर एक पुरानी हवेली थी – लोग बोलते थे 70 साल से बंद है। ज़मींदार साहब की। 1947 में पूरा परिवार गायब हो गया था, बस 8 साल की बेटी की लाश मिली थी – गले में रस्सी। तब से कोई अंदर नहीं जाता।
गाँव के लड़के दारू पी के शर्त लगाते थे – “कोई पूरी रात रुके तो 500 रुपये देंगे।” मैंने मज़ाक में बोल दिया – “मैं रुक जाऊँगा।”
सब हँसे। मैंने बैग में टॉर्च, बिस्किट, पानी, और फोन डाला। रात 11 बजे हवेली के अंदर घुसा। दरवाज़ा खुला हुआ था। अंदर घुप अंधेरा, बदबू, और चमगादड़ उड़ रहे थे। मैंने हिम्मत करके पहली मंज़िल पर एक कमरा ढूंढा, वहाँ बैठ गया।
12 बजते-बजते ठंड लगने लगी। फोन में नेटवर्क नहीं। अचानक सीढ़ियों से किसी के चलने की आवाज़ आई – खट… खट… खट… धीरे-धीरे… जैसे छोटे पैर हों। मैंने टॉर्च मारी – कोई नहीं।
फिर एक पतली सी आवाज़ आई – “भैया… पानी…” लड़की की आवाज़ थी। मैं डर के मारे पसीना छूट गया। बोला – “कौन है?” फिर वही आवाज़ – “मुझे बहुत प्यास लगी है…”
मैंने बैग से पानी की बोतल निकाली और आगे की तरफ बढ़ाया। बोतल अपने आप खिसक गई। गटगट… गटगट… पूरी बोतल खाली। फिर वही आवाज़ – “थैंक यू भैया…”
मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया। पूरी रात वही हुआ – कभी रोने की आवाज़, कभी कोई मेरे कंधे पर हाथ रख देता, कभी कोई फुसफुसाता – “खेलोगे?”
सुबह 5:30 बजे जैसे-तैसे बाहर निकला। गाँव वालों ने 500 रुपये दिए और बोले – “चल अब घर जा।”
मैं घर पहुँचा तो मम्मी चीख पड़ीं – “ये तेरे साथ कौन है?” मैंने पीछे मुड़ के देखा – कोई नहीं था। मम्मी बोलीं – “तेरे कंधे पर एक छोटी बच्ची बैठी है… लंबे बाल, सफेद फ्रॉक…”
मैं रोने लगा। फिर मम्मी ने गाँव के ओझा को बुलाया। ओझा ने देखते ही बोला – “ये ज़मींदार साहब की बेटी गुड़िया है। 1947 में सबको मार के खुदकुशी कर ली थी, बस ये बच गई थी। उसे भी उसी रात फाँसी दे दी गई। अब ये किसी न किसी को अपना भाई मान लेती है।”
ओझा ने पूजा की, नारियल फोड़ा, कुछ मंत्र पढ़े। फिर बोला – “अब ये चली गई… लेकिन एक चीज़ ले गई है।”
मैंने पूछा – “क्या?” ओझा ने मेरे गले की तरफ इशारा किया – “तेरी आवाज़… अब तू कभी बोल नहीं पाएगा।”
तब से आज तक मैं गूंगा हूँ। बोल नहीं सकता। बस लिख सकता हूँ।
लोग पूछते हैं – “500 रुपये के लिए इतना बड़ा नुकसान?” मैं लिख के बताता हूँ – “पैसा नहीं… उस रात मैंने उस बच्ची को पानी पिलाया था। उसने मुझे भाई मान लिया था। वो मुझे ले जाना चाहती थी… मैं बच गया। बस आवाज़ दे दी।”
आज भी जब रात को अकेला होता हूँ… कान में वही पतली सी आवाज़ गूँजती है – “भैया… पानी…”
अगर तुम भी कभी किसी पुरानी जगह पर रात गुज़ारने का प्लान बनाओ… तो एक बोतल पानी ज़रूर साथ रखना। शायद किसी को सच में प्यास लगी हो।
कमेंट में सिर्फ “गुड़िया” लिखो अगर तुमने पूरा पढ़ लिया। और ये कहानी उस दोस्त को भेजो जो कहता है “भूत-वूत कुछ नहीं होता”। फिर देखो वो रात को फोन करेगा या नहीं 😏


