परिचय
कहते हैं—जब इरादे अटूट हों, तो सबसे लंबा रास्ता भी छोटा पड़ जाता है।
यह कहानी झोपड़ी से IAS तक पहुँचने वाली एक लड़की की है, जिसने अपनी गरीबी, संघर्ष और समाज की तानों से ऊपर उठकर ऐसा साबित किया, जो पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन गया।
धरमपुर की वो मिट्टी, जहां सपने भी भूखे सोते थे
एक मिट्टी की झोपड़ी, एक टपकती छत, और एक सपना
उत्तर भारत का छोटा-सा गांव धरमपुर…
रात में कुत्तों की भौंक, मिट्टी की सोंधी महक, और बीच में खड़ी एक कच्ची झोपड़ी—जहां रहती थी पूजा।
बरसात की रातों में छत टपकती थी। गर्मियों में दीवारें धूप से तपकर आग जैसी हो जाती थीं। घर में इतना सामान नहीं था कि उसे घर कहा जाए, लेकिन फिर भी वहां एक चीज़ हमेशा मौजूद रहती थी—उम्मीद।
पूजा अक्सर लालटेन की पीली रोशनी में अपनी फटी-पुरानी किताबें पकड़े बैठी रहती। रोशनी कम होती, लेकिन उसके सपनों की चमक कभी कम नहीं हुई।
गरीबी का हर दिन एक नई चुनौती थाउसके पापा खेतों में मजदूरी करते, पूरे दिन धूप में जलते।
मां गांव के घरों में बर्तन माँजती, झाड़ू लगाती, और पूजा को देखकर हमेशा एक ही बात कहती—
“पूजा, तू पढ़। तू कुछ बड़ा करेगी, देख लेना।”
गांव के लोग ताना मारते—
“अरे, मजदूर की बेटी अफसर बनेगी? बस पढ़ने का नाटक करती है।”
पूजा पहली बार उन बातों से टूटी थी… लेकिन मां की आवाज़ उसके भीतर फिर से हिम्मत बनकर गूंजी—
“डर मत, तू कर सकती है।”
दिन खेतों में, शाम घर के कामों में, रात सिर्फ उसके सपनों में
पूजा हर सुबह किताबों के साथ नहीं, बल्कि खेतों की मिट्टी से दिन शुरू करती।
शाम को घर लौटकर मां के साथ चूल्हे पर रोटियां सेंकती।
कभी आटा कम पड़ जाता, कभी सब्जी नहीं होती, पर पूजा कहती—
“मां, भूख से लड़ लूंगी… पर पढ़ाई नहीं छोड़ूंगी।”
रात को जब गांव सो जाता, हवा में ठंड घुल जाती और कुत्तों की भौंक धीमी पड़ जाती—वहीं पूजा अपनी पुरानी लालटेन जला लेती। उस लौ में उसके सपनों का पूरा आसमान बसता था।
पहली जीत: गांव की सबसे तेज दिमाग वाली लड़की
पूजा ने गांव के स्कूल में टॉप किया।
पहली बार उसके पापा की आंखें गर्व से भर गईं।
मां ने उसका माथा चूमकर कहा—
“मेरी बेटी अभी रुकी नहीं है।”
उसे स्कॉलरशिप मिली और वह शहर पढ़ने पहुंची।
नए माहौल में सब कुछ अजनबी था—तेज़ सड़कें, शोर, भीड़, पर उसके भीतर एक शांत दृढ़ता थी।
शहर के खर्च उठाने के लिए उसने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया।
दिन कॉलेज, शाम ट्यूशन, रात पढ़ाई…
कभी नींद पूरी नहीं होती, पर उसकी मेहनत पूरी होती थी।
वो दिन… जब किस्मत ने उसके सपनों को सलामी दी
UPSC का रिज़ल्ट आया था।
पूजा कांपते हाथों से अपना रोल नंबर ढूंढ़ रही थी।
अचानक उसकी आंखें स्क्रीन पर जम गईं—
उसका नाम था। IAS पूजा कोहली।
वो फूट-फूटकर रोई।
उस रोने में दर्द भी था, सुकून भी… और वो भारी बोझ जो बरसों से उसके सीने पर था, धीरे-धीरे उतरता गया।
धरमपुर में ढोल बजने लगे।
लोग कहते—
“जिस झोपड़ी में बिजली नहीं थी, वहां से एक IAS अफसर निकली है!”
निष्कर्ष (Conclusion)
पूजा की कहानी झोपड़ी से IAS तक की कहानी है।
ये बताती है कि गरीबी, ताने, मुश्किलें—सब छोटे हो जाते हैं जब दिल बड़ा हो।
उसने साबित किया कि मंज़िल नहीं, इरादे इंसान को बड़ा बनाते हैं।
क्या आपके गांव, शहर या आसपास भी कोई पूजा जैसी कहानी है?
नीचे कमेंट में जरूर बताएं।
अगर यह कहानी दिल को छू गई हो, तो इसे दूसरों तक भी पहुंचाएं—क्योंकि प्रेरणा बांटने से बढ़ती है।


