एक समय की बात है, घने जंगल में एक चालाक लोमड़ी और एक धीमा लेकिन लालची कछुआ रहते थे। लोमड़ी अपनी समझदारी और फुर्ती के लिए जानी जाती थी, जबकि कछुआ अपनी धीरे-धीरे चाल और लालच के लिए।
एक दिन कछुआ नदी के किनारे बैठा अपने घर के लिए खाने की चीज़ें इकट्ठा कर रहा था। तभी लोमड़ी वहाँ आई।
लोमड़ी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अरे कछुआ भाई, तुम इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो? थोड़ी देर में नदी में मछलियाँ मिल जाएँगी, उन्हें पकड़ लेना!”
कछुआ, जो हमेशा जल्दी अमीर बनने का सपना देखता था, बोला,
“मुझे पता है, लेकिन मछलियाँ पकड़ने में समय लगेगा। क्या तुम्हारे पास कोई तेज़ और आसान तरीका है?”
लोमड़ी ने चालाकी से कहा,
“अगर हम मिलकर काम करें तो जल्दी बहुत सारा खाना इकट्ठा कर सकते हैं। मैं मछलियाँ पकड़ लूँगी, और तुम उन्हें संभालोगे।”
कछुआ खुशी-खुशी तैयार हो गया।
अगले दिन, लोमड़ी ने मछलियाँ पकड़नी शुरू की, लेकिन हर बार जब कछुआ आकर उन्हें लेने लगता, लोमड़ी जल्दी से मछलियाँ अपने बिल में छुपा लेती।
कछुआ परेशान हुआ और बोला,
“लोमड़ी बहन, तुम्हें तो समझाना चाहिए कि हमें मिलकर काम करना है, अकेले नहीं!”
लोमड़ी हँसते हुए बोली,
“अरे कछुआ भाई, मैं तो बस मज़ाक कर रही थी। तुम थोड़े धीमे हो, इसलिए मैंने सोचा कि थोड़ा खेल खेल लें!”
कछुआ गुस्से में लाल हो गया। उसने अपनी धीमी चाल का फायदा उठाने का विचार किया।
अगले दिन कछुआ अपने घर के पास एक बड़ी गहरी खाई खोदकर उसे पानी से भर दिया। फिर उसने लोमड़ी को बुलाया।
“लोमड़ी बहन, क्या तुम मेरे लिए थोड़ा और खाना ला सकती हो?”
लोमड़ी, जो अब भी चालाक और नासमझ थी, खुशी-खुशी वहाँ आई। जैसे ही उसने खाई के पास पैर रखा, वह फिसल कर खाई में गिर गई।
कछुआ बोला,
“देखा! जो लालची और चालाक होता है, उसे कभी-कभी अपनी चालाकी में ही फँसना पड़ता है।”
लोमड़ी शर्मिंदा हुई और वादा किया कि वह अब कभी किसी को धोखा नहीं देगी। कछुआ ने भी सीखा कि धैर्य और समझदारी से काम करना ही सबसे अच्छा है।
कहानी की सीख
धैर्य और समझदारी हमेशा लालच और छल से बेहतर होते हैं।
यह पंचतंत्र की कहानी बच्चों को ईमानदारी और समझदारी का महत्व सिखाती है।


