कभी-कभी पहली नज़र में प्यार नहीं होता, लेकिन पहली बात ही दिल को छू जाती है। आरव और शिखा की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी—जिसमें मुलाक़ात अचानक हुई, बातचीत अनायास शुरू हुई, और फिर दिलों में कुछ अनकहा-सा बसता चला गया। एक कॉफ़ी शॉप के कोने में बैठे दो लोग, दो आधी ठंडी कॉफ़ी और एक छोटी-सी बहस, उनकी ज़िंदगी की शुरुआत बन गई। आरव ने मुस्कुराकर पूछा, “तुम हमेशा सही कैसे हो सकती हो, शिखा?” और शिखा ने भी बिना रुके जवाब दिया, “और तुम हमेशा ग़लत कैसे हो सकते हो?” दोनों मुस्कुराए, शायद इसलिए कि उस हंसी में एक अजीब-सी सहजता थी—जैसे उन्हें एक-दूसरे से जुड़ने का बहाना मिल गया हो।
धीरे-धीरे कॉलेज प्रोजेक्ट उनकी मुलाक़ातों का ज़रिया बन गया। लाइब्रेरी में बैठकर काम करते हुए, कैंटीन की टेबल पर बहस करते हुए, और क्लास के बाद साथ-साथ चलते हुए, दोनों के बीच की दूरी कम होती गई। आरव की शांति शिखा को सुकून देती थी, और शिखा की तेज़, बेबाक बातों में आरव को वह ऊर्जा मिलती थी जो उसकी दुनिया में कहीं खो गई थी। वे अलग थे, लेकिन शायद इसी अलग होने में उनकी समानता छिपी थी।
कुछ ही समय में दोस्ती, अनजाने में, प्यार का रूप लेने लगी। शिखा को अच्छा लगने लगा कि कोई उसका इंतज़ार करता है, और आरव को अच्छा लगने लगा कि कोई है जो उसकी चुप्पी भी समझता है। कोई बड़े इज़हार नहीं हुए, लेकिन छोटे-छोटे क्षणों में दोनों ने महसूस कर लिया था कि वे एक-दूसरे की ज़रूरत बन चुके हैं। प्यार धीरे-धीरे गहराता गया… लेकिन साथ ही एक और चीज़ उनके रिश्ते में जगह बनाने लगी—जिद।
रिश्ता जितना खूबसूरत था, उतना ही नाज़ुक भी। बहसें दोनों के अहंकार को और मजबूत करती गईं। कौन पहले कॉल करेगा, कौन पहले माफ़ी माँगेगा, कौन पहले झुकेगा—यह सब तय करना उनके लिए लड़ाई जैसा बन गया। ग़लती चाहे जिसकी भी हो, पहला कदम कोई नहीं उठाना चाहता था। रात को Goodnight कहने जैसा साधारण संदेश भी एक “इगो गेम” बन गया। कभी शिखा इंतज़ार करती रही, कभी आरव; और कई बार ऐसा हुआ कि इंतज़ार करते-करते संदेश भेजा ही नहीं।
लंबी चुप्पियाँ, छोटी-छोटी नाराज़गियाँ, और दोनों की जिद—यह सब धीरे-धीरे रिश्ते में दूरी घोलने लगा। उन्होंने कभी आधिकारिक रूप से ब्रेकअप नहीं किया, लेकिन उनका रिश्ता टूटने के कगार पर खड़ा हो गया। एक दिन बातें कम हुईं, फिर बहुत कम, और फिर महीनों तक दोनों ने एक-दूसरे की प्रोफ़ाइल तक नहीं खोली। बावजूद इसके, दोनों के दिलों में प्यार जस का तस था। बस जिद, प्यार को छुपाकर रखे हुए थी।
और फिर एक दिन, किस्मत ने सबसे बड़ा मोड़ ला दिया।
शिखा की शादी तय हो गई।
घरवालों को लगा कि अब और इंतज़ार करना ठीक नहीं। शिखा ने कोई विरोध नहीं किया, शायद इसलिए कि वह खुद अनिर्णय में थी—क्या वह अपनी भावना के लिए लड़े या ख़ामोशी को ही किस्मत मान ले। कई बार उसने फोन उठाया, आरव का नंबर टाइप किया, लेकिन हर बार उंगलियाँ स्क्रीन पर ठहर जातीं। उसे डर था, कहीं वह जो कहे, वो देर से कहा गया एक सच न बन जाए।
दूसरी तरफ, आरव को किसी दोस्त ने फोन कर के बताया, “शिखा की शादी अगले महीने है।” बस वो वाक्य सुनते ही उसकी दुनिया जैसे ढह गई। उस रात वह खुद को समझा नहीं पाया। उसने अपने कमरे में चीखकर रोया, दीवारों पर हाथ मारे… लेकिन सबसे ज़्यादा, उसने खुद को दोष दिया कि उसने क्यों नहीं कहा जो दिल में था। क्यों वह पहले कदम उठाने में इतना देर कर गया? क्यों वह जिद में रिश्ते को भूल गया?
किस्मत ने एक आख़िरी मौका रखा था—और उसे निभाने का वक्त अब आया था।
शादी से एक हफ्ता पहले, शिखा लखनऊ अपने नाना से मिलने जा रही थी। प्लेटफॉर्म पर कदम रखते ही उस पर एक अजीब सा बोझ उतर आया था। लोगों की भीड़, गाड़ियों की सीटी, चाय की आवाज़—सब सामान्य था, लेकिन उसके अंदर की उथल-पुथल उसे शांत रहने नहीं दे रही थी। उसका हाथ टिकट को बार-बार दबा रहा था, जैसे उस कागज में कोई जवाब छिपा हो। उसकी आँखें कई बार नम हुईं, लेकिन उसने पलकें झुका कर आँसू छिपा लिए, जैसे खुद से ही कोई सच स्वीकार करने में डर लग रहा हो।
और तभी… पीछे से एक धीमी, लेकिन गहरे तक उतर जाने वाली आवाज़ आई—
“शिखा…”
उसने धीरे से मुड़कर देखा।
आरव सामने था।
आँखों में नमी, चेहरे पर थकान, और दिल में छुपा दर्द साफ़ दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दिनों से सोया नहीं, खाया नहीं, बस एक ही बात सोचता रहा—आज वो इसे खो देगा।
कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, बिना कुछ कहे, लेकिन दिल बहुत कुछ कह चुका था। शिखा के गले में शब्द अटक गए। आरव थोड़ा और पास आया और धीमे स्वर में बोला, “मैं माफ़ी माँगने नहीं आया… बस ये जानने आया हूँ—क्या तू आज भी मुझसे प्यार करती है?”
शिखा की पलकों से आँसू टूटकर गिर पड़े। उसने जवाब देने की कोशिश की, पर आवाज़ टूट रही थी। किसी तरह उसने कहा, “हाँ आरव… प्यार आज भी है… लेकिन अब कुछ बदल नहीं सकता।”
आरव ने उसकी आँखों में देखा और वह सब कह दिया जो महीनों से भीतर दफन था। “तो कुछ बदलने की ज़रूरत भी नहीं। मुझे तेरे बिना जीना नहीं आता, शिखा। और मैं ये सच कहे बिना तुझे जाने नहीं दे सकता था।”
इतने में ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ गई।
हवा तेज़ हो गई।
लोग इधर-उधर भाग रहे थे, सामान उठा रहे थे, सीटें खोज रहे थे।
लेकिन उन दो दिलों के लिए समय वहीं ठहर गया था।
शिखा फुसफुसाई, “अगर मैं आज इस ट्रेन में बैठ गई… तो हमेशा के लिए दूर हो जाऊँगी।”
आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। “तो मत जाओ।”
उस एक वाक्य ने सबकुछ बदल दिया।
शिखा ने ट्रेन छोड़ दी।
शादी छोड़ दी।
और आखिरकार, अपना दिल चुन लिया।
दोनों की कहानी का नया अध्याय वहीं स्टेशन पर शुरू हुआ—जहाँ भीड़ थी, शोर था, लेकिन उनके बीच सिर्फ़ सुकून था।
अब रिश्ता दो लोगों का नहीं, दो दिलों का था—जिसमें न जिद थी, न अहंकार। अब अगर बहस होती, तो आरव कहता, “चलो, इस बार मैं झुक जाता हूँ,” और शिखा मुस्कुराकर जवाब देती, “अगली बार मेरी बारी।”
उनके रिश्ते में अब जीत-हार नहीं थी, सिर्फ़ साथ निभाने की जिद थी।
अब ईगो नहीं, एहसास था।
अब चुप्पी नहीं, संवाद था।
कहानी यहाँ खत्म नहीं होती… क्योंकि हर प्रेम कहानी एक सीख भी देती है। रिश्ते वहीं टूटते हैं, जहाँ लोग सही होने की लड़ाई में प्यार भूल जाते हैं। कभी तुम झुको, कभी मैं—यही रिश्ते की असली खूबसूरती है। वरना दो सही लोग हमेशा एक-दूसरे से दूर ही रह जाते हैं।
अगर आपके दिल में भी कोई अब तक ज़िंदा है… तो इंतज़ार मत करिए।
कभी-कभी पहला कदम ही पूरा रिश्ता बदल देता है।


